समान अधिकार

इस पृथ्वी पर पैदा होने वाले प्रत्येक मानव का अधिकार समान है। इंसान के रूप में सबकी हैसियत बराबर है। इंसानों के बीच जो देश की सीमाएं, वर्ण, भाषा है इनकी कोई वास्तविकता नहीं है। मानव ने इन्हें अपनी जरूरतों के हिसाब से अपना लिया है। सच्चाई यह है कि मानव सिर्फ मानव है। यहां पर लोगों ने उसे विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों में बांट दिया है। मानव एक सामाजिक प्राणी है, उसने अपने समाज के हिसाब से जीवन की पद्धतियों को अपनाया है। सबकी अपनी जीवन शैली है। सबकी अपनी विचारधारा है। मनुष्य आज के युग में आपा-धापी में जी रहा है। कुछ लोग जो ऊंच-नीच की मानसिकता को बढ़ावा देते हैं, छोटे-बड़े का फर्क करते हैं, यहीं से समस्याएं खड़ी होती हैं और यहीं से मानवाधिकारों का हनन शुरू हो जाता है। इस विश्व में स्त्री और पुरूष को भी हीनता और श्रेष्ठता की श्रेणियों में बांट दिया गया है। कुछ समाज में पुरूष की अपेक्षा महिलाओं को कम सम्मान मिलता है तथा उनके अधिकार भी कम माने जाते हैं। ऐसा सोचना भी गलत है। मानव एक मानव के रूप में रहते हुए आज यदि प्रगति करता तो दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होता। यही वजह है कि हमारे समाज में, देश-दुनिया में जाति और वर्ग के बंधन हैं। इनसे तमाम तरह की विसंगतियां पैदा होती हैं।
वर्षों तक मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए अलख जगाने के लिए ऑल इंडिया हयूमन राइट्स एसोसिएशन ने कई पहल कीं। इस संघ से देश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग के लोग जुड़े, जिसकी वजह से 'एहरा' का उद्देश्य बहुआयामी हो गया। 'एहरा' ने मानवता व मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया है। 'एहरा' के स्वयंसेवक देश के कोने-कोने में मानवाधिकारों के बारे में अलख जगा रहे हैं। चाहे उत्तर भारत हो, दक्षिण भारत, पश्चिम भारत हो या मध्य भारत। सभी जगहों पर मानवाधिकारों के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए 'एहरा' के कार्यकर्ताओं का योगदान सराहनीय रहा है। यह प्रयत्न सतत् चलता रहेगा।
'एहरा' के अध्यक्ष डॉ. एम. यू. दुआ ने देश और दुनिया में मानव के विभिन्न रूपों को देखा है। कहीं इन्होंने दीन-दुखियों को देखा, कहीं ऊंची अट्ालिकाओं में रहने वाले लोगों को, कहीं बड़ी-बड़ी कारों मेंं चलने वाले लोगों को देखा, तो कहीं पर पेट भरने के लिए परेशान लोगों को देखा। कहीं लोग ज्यादा खाकर परेशान हैं तो कहीं लोग कुछ खाने के लिए तरस रहे हैं। किसी के पास डॉक्टर के यहां जाने और उसकी फीस देने के पैसे नहीं है तो कोई दिन में 4-4 तरह के डॉॅक्टरों से अपना चेकअप करवाता है। इन तमाम अनुभवों को लेने के बाद 'एहरा' ने यह महसूस किया कि उन्हें अपने अनुभवों और विचारों को लोगों तक पहुंचाना चाहिए इसलिए 'एहरा' ने हयूमन राइट्स पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। अपने विचारों से श्री दुआ ने लोगों को अवगत कराया। अब पुस्तक के माध्यम से अपने विचारों और सुझावों को लोगों तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। यह पुस्तक उसी की पहली कड़ी है। इस पुस्तक को लिखने के लिए डॉ. एम. यू. दुआ ने विभिन्न पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और ग्रन्थों का अध्ययन किया तथा अपने मित्रों, सहयोगियों, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श किया। यह उनका पहला प्रयास है। उम्मीद है उनका प्रयास सार्थक साबित होगा।
भारत में मानवाधिकारों के बारे में लोगों में न तो पर्याप्त जागरूकता है न ही उतनी उत्सुकता। मानवाधिकार एक गंभीर विषय है। मानवाधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के विचारों से समाज लाभांवित होता है परन्तु ऐसे लोगों के विचार पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, टीवी या अन्य संचार माध्यम द्वारा सामने आते हैं जो कि काफी सीमित होते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों के संबंध में सार्थक प्रयास किए हैं।
1993 से भारत में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन हुआ। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने इस संबंध में कई सराहनीय पहल भी की हैं। इसके साथ-साथ अन्य संगठन भी मानवाधिकारों के बारे में जागृति पैदा करने में लगे हुए हैं। उसी कड़ी में 'एहरा' भी अपने प्रयासों से जन-जन को उसके मूल अधिकारों एवं मानवाधिकारों से परिचित कराने की मुहिम में लगा हुआ है। इस पुस्तक में तमाम पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। 'एहरा' का कदम यही नहीं रूकेगा। विभिन्न विषयों पर 'एहरा' पुस्तकों को प्रकाशित कर जन-जन तक पहुंचाना चाहती है। इस पुस्तक के बाद अगली पुस्तक भी शीघ्र ही प्रस्तुत की जाएगी। 'एहरा' का मिशन मानवीय है। वह मानवता को बढ़ावा देने के लिए अपने मिशन में लगा हुआ है। मानवाधिकारों के प्रति हर व्यक्ति को जागरुक कर देना, हर व्यक्ति को उसके अधिकार दिलाना भी 'एहरा' का लक्ष्य है।
'एहरा' ने अपने 27 वर्ष की यात्रा में तीन बड़ी यात्राओं का आयोजन किया है और ये यात्राएं देश के गांव-गांव, गली-गली और पगडंडियों से गुजरी हैं। 'एहरा' देश की हर स्थिति से वाकिफ है। अभी देश के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। आजादी के 66 वर्ष बीत जाने पर भी अभी देश में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। महिलाओं को उनका पूरा अधिकार नहीं मिला है। आज भी बाल मजदूरी जारी है तथा मजदूरों का शोषण हो रहा है। दबंगों की दबंगई आज भी जारी है, न्याय मिलने में आज भी विलंब होता है। गरीबों को सच्चा और त्वरित न्याय मिले इसके लिए भी 'एहरा' प्रयासरत रहा है।
'एहरा' ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भी एकल खिड़की व्यवस्था की सिफारिश की है। इसी तरह से 'एहरा' ने अपनी 37 सूत्रीय मांगों को सरकार के पास भेजा है। उसकी 37 सूत्रीय मांगों में प्रायः हर तरह की बातें शामिल हैं। इसी में राष्ट्र भाषा घोषित करने की मांग की गई है। भारतीयता की एक पहचान की बात कही गई है। इसी तरह से महिला सशक्तिकरण, बच्चों की शिक्षा, सभी को बुनियादी सुविधाएं देने की मांग भी की गई है। शहरी विकास की तरह ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने की बात की गई है। कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने व कृषि को उद्योग का दर्जा देने की मांग की गई है। इसी मांग पत्र में यह मांग भी शामिल है कि सभी मानव समान हैं अतः वीआईपी व्यवस्था खत्म की जाए। इसके साथ ही कानूनी प्रक्रिया व जांच एजेंसियों के कार्यों में पारदर्शिता लाने की मांग की गई है। समाज सुधारकों को व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यथोचित सम्मान देने की मांग की गई है। मानवाधिकारों की जागरूकता के लिए विशेष कोष की मांग की गई है। इसी तरह 'एहरा' ने देश के हर वर्ग के लिए सहूलियते बढ़ाने की मांग की है। 'एहरा' का प्रयास आगे भी आम आदमी को यथोचित लाभ दिलाने के लिए जारी रहेगा। हमें आपके सहयोग की आवश्यकता है। आशा है आपका सहयोग हमें मिलता रहेगा।


डॉ. एम. यू.दुआ
राष्ट्रीय अध्यक्ष, 'एहरा'


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